swm news...यहां एक दशक से मृत्युभोज में शामिल नहीं हुए 11 स्कूली बच्चे

Patrika 2025-03-02

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सवाईमाधोपुर.शिक्षक का काम केवल स्कूल में पढ़ाना ही नहीं होता है बल्कि सही मायनों में वह समाज की दिशा भी बदल सकता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है सवाईमाधोपुर जिले के शेरपुर-खिलचीपुर निवासी भामाशाह व अध्यापक राजेशपाल मीणा ने की। शिक्षक की प्रेरणा से राउप्रावि सेदरी(कुण्डेर)टोंक में कार्यरत शिक्षक ने पिछले दस वर्षों से मृत्युभोज कुप्रथा के खिलाफ विद्यार्थियों में जागरूकता पैदा करने के लिए एक सामाजिक अभियान की पहल चला रखी है। विद्यालय में 11 छात्र-छात्राएं ऐसे है। इनमें से चार छात्र एवं सात छात्राएं शामिल है। इन पर परिवार व समाज का भारी दबाव है। इसके बावजूद भी छात्र-छात्राएं कभी मृत्युभोज में शामिल नहीं हुए।
अभिभावकों से भी करते है समझाइश
कई बच्चों के माता-पिता मृत्युभोज में जाते है, मगर ये अबोध बच्चे अपने अभिभावकों को भी जाने से मना करते है। इनके त्याग व समर्पण की भावना को देखते हुए स्थानीय विद्यालय में समारोह के दौरान इन बच्चों को पुरस्कृत किया। गांव में किसी का मृत्यभोज होने पर भामाशाह व अध्यापक राजेश मीणा स्वयं अपने खर्चे से बच्चों के लिए मिठाई मंगवाते है।
अब अंतर जिला शैक्षिक भ्रमण करेंगे नौनिहाल
विद्यालय के प्रधानाध्यापक शंकरलाल मीना ने बताया कि समारोह में भामाशाह अध्यापक राजेशपाल मीणा ने सभी बच्चों के लिए मिठाई के प्रबंध किए और बच्चों को पुरस्कार प्रदान किया। इससे बच्चों के चेहरे खिल उठे। उधर, अब इन सभी बच्चों को अंतर जिला शैक्षिक भ्रमण कराया जाएगा। इन बच्चों को पिछले साल आगरा का भ्रमण कराया था।
इसलिए बच्चों को जागरूक करने की ठानी
मृत्युभोज एक सामाजिक कुरीति है। इसको लेकर हर समाज के लोगों को इसके खिलाफ लड़ाई लडऩी चाहिए। मृत्युभोज जैसी परपंरा को निभाने के लिए गरीब लोगों की कमर टूट जाती है। गरीब लोग ब्याज पर पैसे लेकर समाज को दिखाने के लिए मृत्युभोज जैसी परंपरा को निभाते हैं। ग्रामीण इलाके में देखा जाए तो एक दूसरे को देखकर उससे अच्छा करने की ठान लिया जाता है। इसकी वजह से कई लोग कर्जा भी ले लेते हैं। उनका मानना है कि मृत्युभोज के खर्चे को बच्चों के भविष्य के लिए उपयोग किया जाए तो अच्छा रहेगा।

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